51 शक्तिपीठों में एक है विंध्याचल, नवरात्र में यहाँ अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं तांत्रिक

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मीरजापुर। मां विंध्यवासिनी एक ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा। यहां देवी के तीन रूपों के दर्शन-पूजन का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णन है। मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक विंध्याचल की देवी मां विंध्यवासिनी हैं। विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की पवित्र नदियों की कल-कल करती ध्वनि, प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती है।

त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती का रूप धारण करती हैं। विंध्य पर्वत पर स्थित मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की यतात्रि देवी विंध्यवासिनी। कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे निश्चित रूप से सिद्धि प्राप्त होती है। विविध संप्रदाय के उपासकों को मनोदशा के फल देने वाली माता विंध्यवासिनी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं।

ऐसी मान्यता है कि सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता है। यहाँ पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्धि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्ध पीठ के रूप में विख्यात है। आदि शक्ति की शाश्वत लीला भूमि मां विंध्यवासिनी के धाम में पूरे वर्ष दर्शना आरतीयों का आना-जाना लगा है। चैत्र व शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां देश के कोने-कोने से लोगों का समूह जुटता है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं। केवल वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्रीदुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है।

51 शक्तिपीठों में एक विंध्याचल है

विध्य पर्वत श्रृंखला के मध्य पतित पावनी गंगा के कंठ पर विराजमान विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक विंध्याचल है। सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है। तीनों के केंद्र में मां विंध्यवासिनी हैं। यहाँ पास ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली और अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं।

वैदिक और वाम मार्ग विधि से होता है पूजन

शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी ने कहा है। माँ के अन्य नाम कृष्णुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक और वाम मार्ग विधि से पूजन होता है।

यहाँ होते हैं देव के पूरे विग्रह के दर्शन

शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं है। विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहाँ देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।

Vindhyacha

दिन में चार बार होता है विशेष मेक

नवरात्र के साथ ही मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर 4 बजे तक बंद रहते हैं।

यहाँ अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं तांत्रिक

नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी और दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। आधी रात के बाद रोंगटे खड़े कर देने वाली पूजा शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं।

नवरात्र में मंदिर के पताका पर वास करती हैं मां विंध्यवासिनी

कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में मां मन्दिर की पताका पर वास करती हैं इसलिए किसी कारण से मंदिर में न पहुंच पाने वालों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं। नवरात्र के दिनों में इतनी भीड़ होती है कि स्वच्छंद लोग मां की पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं।

बेकार नहीं जाता सच्चे दिल से की गई पूजा

कहते हैं कि सच्चे दिल से यहाँ की गई माँ की पूजा कभी बेकार नहीं जाती। हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन जय माता विंध्यवासिनी के उद्घोष के साथ करते हैं।

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त्रिकोण यात्रा का विशेष महत्व

माँ के इस धाम में त्रिकोण यात्रा का विशेष महत्व होता है, जिसमें लघु और बृहद त्रिकोण यात्रा की जाती है। लघु त्रिकोण यात्रा में एक मंदिर परिसर में मां के तीन रूपों के दर्शन होते हैं। वहीं दूसरी ओर बृहद त्रिकोण यात्रा में तीन अलग-अलग रूपों में मां विंध्यवासिनी, मां महाकाली और मां अष्टभुजी के दर्शन का सौभाग्य भक्तों को मिलता है।

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