प्रकृति पर्यावरण का वह हिस्सा है जो मानव नियंत्रण से परे: प्रो। ध्रुवसेन

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लखनऊ। जलवायु परिवर्तित हो रही है और यह सार्वभौमिक सत्य है कि आने वाले दिनों में पर्यावरण और जलवायु संशोधित होगी लेकिन उसके परिवर्तन की दशा और दिशा क्या होगी। यह अभी भी तर्क का विषय है। ये बातें लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो। ध्रुव सेन सिंह ने कही। वे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार के मंगलवार से शुरू हुए व्याख्यान माला “गंगोत्री हिमनद के सन्दर्भ में जलवायु परिवर्तन: प्राकृतिक या मानव जनित” विषय पर पहले दिन बोल रहे थे। आईआईओएस पूणे के वैज्ञानिकों ने इसे संचालित किया। प्रोफेसर ध्रुव सेन सिंह, लखनऊ विश्‍वविद्यालय आर्कटिक (उत्तरी ध्रुवीय छेत्र) में जाने वाले भारत के पहले अभियान दल के सदस्य रहे। प्रोफेसर ध्रुव सेन सिंह, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सरस्वती सम्मान, विज्ञान रत्न और शिक्षक श्री से सम्मानित हैं।

प्रोफसर ध्रुव सेन सिंह ने कहा कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का प्रमाण हिमनदों में हो रहे परिवर्तन से प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त होता है और विचार यह माना जाता है कि हिमांदों के तेजी से पिघलने का कारण पर्यावरण और जलवायु में हो रहा परिवर्तनशील है, जो)। मानवीय गतिविधियों के परिणाम स्वरूपुप रहा है। यह सर्वविदित है कि मानव के अथक प्रयास के बाद भी विश्व की सारी प्राकृतिक आपदाए आज भी मानव नियंत्रण से परे है। मानव यदि सभी प्राकृतिक प्रक्रियाओं के लिए निष्क्रिय है तो वह केवल पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के लिए कैसे सक्रिय हो सकता है।

प्रकृति पर्यावरण का वह हिस्सा है जो मानव नियंत्रण से परे है। मानवीय गतिविधियों के परिणाम स्वरूपुप, पर्यावरण और जलवायु में हो रहे परिवर्तन की दर को अधिक और कम किया जा सकता है। मानव जनित गतिविधियों के परिणाम स्वरुपवादर्जित हरित गैसों के द्वारा वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि से हिमालय के आकार में परिवर्तन देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि मानव की संस्कृति और सभ्यता, प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु से नियंत्रित होती है। अतः पर्यावरण और जलवायु में परिवर्तन हमारे समाज को प्रभावित करता है। समाज के सतत विकास के लिए पर्यावरण और जलवायु मे हो रहे परिवर्तन और यह परिवर्तन प्राकृतिक है या मानव जनित की जानकारी अति आवश्यक है।

प्रो। ध्रुव ने कहा कि हिमालय में स्थित गंगोत्री हिमनद ने तेजी से पिघलने के कारण पुरे विश्व का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया है। विगत वर्षो के अध्ययन के परिणाम स्वरुप हम यह कह सकते हैं कि गंगोत्री हिमनद का तेजी से पिघलना मात्र मानव जनित ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम नहीं है। अगर गंगोत्री हिमनद के तेजी से पिघलना का कारण सिर्फ मानव जनित ग्लोबल वार्मिंग होता है, तो भोगोलिक परिस्तिथि में स्थित सभी हिमनद समान दर से पीछे खिसकते हैं। जब ‘ऐसा नहीं है’

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